वातावरण का अर्थ और प्रकार व बालक के विकास पर वातावरण का प्रभाव

वातावरण का अर्थ और प्रकार व बालक के विकास पर वातावरण का प्रभाव

एक बालक के विकास पर वातावरण का प्रभाव पड़ता है तो आज इसी आर्टिकल में हम जानेंगे कि “(Environment In Hindi) वातावरण का अर्थ क्या है? वातावरण कितने प्रकार के होते हैं? और बालक के विकास पर वातावरण पर क्या प्रभाव पड़ता है? 

वातावरण का अर्थ (Mean of Environment In Hindi)

वातावरण का अर्थ और प्रकार व बालक के विकास पर वातावरण का प्रभाव
वातावरण का अर्थ

वातावरण शब्द बहुत ही विस्तृत शब्द है। वातावरण से अभिप्राय उन परिस्थितियों से है जो बालक पर गर्भाधान (Conception) मे लेकर मृत्यु तक अपना प्रभाव डालता है।

वातावरण के लिए ‘पर्यावरण’ शब्द का भी प्रयोग किया है। पर्यावरण दो शब्दों से मिलकर बना है – परि + आवरण [परि – चारों ओर तथा आवरण – ढकने वाला] अर्थात् हम कह सकते हैं कि एक व्यक्ति के चारों ओर जो कुछ भी होता है, वही उसका वातावरण कहलाता है। 

इसमें वे सभी तत्व सम्मिलित किए जा सकते हैं जो व्यक्ति के जीवन और व्यवहार को प्रभावित करते हैं।

• बाह्य वातावरण में वे सभी परिस्थितियाँ आती है, जो सामूहिक या मिश्रित रूप से बालक के विकास और व्यवहार को प्रभावित करती रहती है, वातावरण या पर्यावरण कहलाता है। 

स्टीफन्स ने लिखा है- "एक बच्चा जितने अधिक समय उत्तम पर्यावरण में रहता है, वह उतना ही उत्तम प्रवृत्ति का होता जाता है और जितने अधिक समय वह हानिकारक पर्यावरण में रहता है, प्राय: उतना ही उसका राष्ट्रीय मान गिरता जाता है।"

वातावरण से जुड़े प्रमुख तथ्य

  1. वातावरण व्यक्ति को प्रभावित करने वाला तत्व है।
  2. वातावरण में सभी बाह्य तत्व आते हैं अर्थात् यह एक तत्व न होकर समूह तत्व होते हैं।
  3. वातावरण व्यक्तित्व को सकारात्मक व नकारात्मक दोनों प्रकार से प्रभावित करता है।
एनास्टसी के अनुसार, वातावरण वह वस्तु है, जो पित्र्येकों के अतिरिक्त प्रत्येक वस्तु को प्रभावित करती है।
बोरिंग, लेगफील्ड, वेल्ड के अनुसार, जीन्स के अलावा प्रत्येक कारक वातावरण है।
वुडवर्थ और मार्क्विस के अनुसार, "वातावरण में वे सभी तत्व आ जाते हैं, जो बालक को अपना जीवन आरम्भ करने के समय से ही प्रभावित करते हैं।"
रॉस (Ross) के अनुसार, "वातावरण वह बाहरी शक्ति है जो सबको प्रभावित करती है।"

वातावरण के प्रकार (Types of Environment In Hindi)

व्यक्ति के चारों ओर जो कुछ भी है वही उसका परिवेश/ वातावरण/पर्यावरण है। बालक जिस परिवेश / वातावरण में निवास करता है, वहाँ का सम्पूर्ण वातावरण बालक के विकास पर पूर्णरूप से प्रभाव डालता है। 

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वातावरण को मुख्यतया दो भागों में आंतरिक वातावरण एवं बाह्य वातावरण में विभाजित किया जाता है।

आंतरिक वातावरण (Internal Environment)

आंतरिक वातावरण का आशय गर्भावस्था की उन परिस्थितियों से है जो भ्रूण को चारों ओर से घेरे रहती है। इसे ‘अन्तः कोशीय वातावरण’ भी कहते हैं।

उदाहरण- महाभारत काल की अभिमन्यु की कहानी से स्पष्ट होता है कि गर्भस्थ शिशु भी सुन व समझ सकता है इसीलिए माँ के स्वस्थ होने पर बालक में भी स्वस्थ होने के लक्षण प्रकट होते हैं।

बाह्य वातावरण (External Environment) 

बाह्य वातावरण के अन्तर्गत वे सभी परिस्थितियाँ आती हैं जो सामूहिक या मिश्रित रूप से उसके बाह्य विकास और व्यवहार को प्रभावित करती रहती हैं। 

बाह्य वातावरण को दो भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है /-

  1. भौतिक वातावरण
  2. सामाजिक वातावरण

भौतिक वातावरण

इसे प्राकृतिक वातावरण भी कहते हैं, जन्म के बाद वातावरण से सम्पर्क होने पर जैसे हवा, पेड़, पौधे, घर, भोजन आदि भौतिक एवं जलवायु से सम्बन्धित कारक हैं, जो बालक के विकास को पूर्णरूप से किसी-न-किसी प्रकार से आजन्म प्रभावित करता रहता है।

सामाजिक वातावरण

सामाजिक वातावरण का तात्पर्य उन सभी परिस्थितियो से है जो बालक के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास पर प्रभाव डालते है। मानव समाज में प्रचलित सभी सामाजिक परिस्थितियों, रीति-रिवाज, प्रथाएँ, रूढ़ियाँ, रहन-सहन आदि सामाजिक वातावरण के अन्तर्गत आते हैं।

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बालक पर वातावरण का प्रभाव (Effect of Environment on Child)

बालक के व्यक्तित्व के प्रत्येक पहलू पर भौगोलिक, सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण का व्यापक प्रभाव पड़ता है।

शारीरिक अंतर पर प्रभाव

भिन्न-भिन्न वातावरण के कारण चीन, जापान, अमेरिका व भारत के लोगों के शारीरिक आकार, रंग व रूप में भिन्नता पाई जाती है ।

मानसिक विकास पर प्रभाव

भिन्न-भिन्न वातावरण के कारण भूमध्य रेखा के पास रहने वाले तथा तटों के पास वाले लोगों की मानसिक स्थिति में भिन्नता पाई जाती है।

जैसे-शहर का शिक्षा के प्रति अच्छा वातावरण रहने के कारण वहाँ के बच्चों का मानसिक विकास अच्छा होता है और गाँव का वातावरण शुद्ध/उचित होने के कारण बालक का शारीरिक विकास अच्छा रहता है।

प्रजाति की श्रेष्ठता का प्रभाव

कुछ विद्वानों का मानना है कि कुछ प्रजातियों की बौद्धिक श्रेष्ठता का कारण वंशानुक्रम नोकर वातावरण है। क्लार्क ने अमेरिका के कुछ गोरे और नीग्रो प्रजाति के लोगों की बुद्धि परीक्षा ली जिससे पता चला कि नीग्रो प्रजाति का बुद्धि स्तर गोरे प्रजाति के बुद्धि स्तर से निम्न है क्योंकि उनको अमेरिका की श्वेत प्रजाति के जैसा समाज, शैक्षिक, सांस्कृतिक और सामाजिक वातावरण उपलब्ध नहीं हो पाता है।

बुद्धि पर प्रभाव

वातावरण का भी बुद्धि पर प्रभाव पड़ता है।

जैसे-मोगली व टारजन को शैक्षिक एवं सामाजिक वातावरण नहीं मिल पाया। अतः उनकी बुद्धि लब्धि सामान्य व्यक्ति से कम रही।

बालक पर बहुमुखी प्रभाव

वातावरण बालक के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक आदि सभी अंगों पर प्रभाव डालता है। इसकी पुष्टि ‘एवेरोन’ के जंगली बालक के उदाहरण से की जा सकती है।

जैसे-किसी बालक को जन्म के बाद भेड़िया उठा ले गया और उसका पालन-पोषण जंगली पशुओं के बीच हुआ। कुछ शिकारियों ने उसे पकड़ लिया। उस समय वह 11 से 12 वर्ष का था। उसकी आकृति पशुओं के जैसी थी और वह पशु के समान ही हाथ और पैर दोनों से चलता था। वह कच्चा माँस खाता था और मनुष्यों के समान बोलने और विचार करने की क्षमता भी नहीं थी। बाद में उसको मनुष्य के समान सभ्य व शिक्षित बनाने का प्रयास किया गया लेकिन सभी प्रयास विफल हुए।
आर.एस. वुडवर्थ का कथन है कि " वंशानुक्रम व वातावरण का सम्बन्ध जोड़ के समान न होकर गुणा के समान अधिक है। अतः व्यक्ति इन दोनों तत्वों का गुणनफल है, योगफल नहीं।"

तो आज हमने बाल विकास पर वातावरण का प्रभाव व वातावरण का अर्थ और प्रकार के बारे में जाना।

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में अपने शौक व लोगो की हेल्प करने के लिए Part Time ब्लॉग लिखने का काम करता हूँ और साथ मे अपनी पढ़ाई में Bed Student हूँ।मेरा नाम कविश जैन है और में सवाई माधोपुर (राजस्थान) के छोटे से कस्बे CKB में रहता हूँ।


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